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जमानत

 जमानत 


    मित्र रिश्तेदार आदि के सुख दुःख में साथ रहना ही वास्तविक रिश्ता होता है... जो रिश्तेदार मुसीबत में अपने रिश्तेदार के किसी काम ना आए, वो रिश्तेदार कहलाने का अधिकार नहीं है... जो मित्र अपने मित्र की किसी मुसीबत में साथ नहीं दे, ऐसा मित्र ना हो तो ही अच्छा है... लेकिन कई बार रिश्तेदार या मित्र हमारी भावना का दोहन करके हमारा मिसयूज कर लेते हैं... इसलिए मित्रता या रिश्तेदारी थोड़ी सावधानी से निभाई जानी चाहिए... नहीं तो बड़ी मुसीबत में पड़ने में समय नहीं लगता है... आज हम जमानत के बारे में जानेंगे... कि अगर हम किसी की जमानत दे देते हैं या जमानती बन जाते हैं और अगला जमानत पर छूटने के बाद हमारी बात नहीं मानता है और तारीख पर कोर्ट में हाजिर नहीं होता तो हम किस प्रकार की परेशानी में पड़ सकते हैं...

      जमानत
  1. अग्रिम जमानत
  2. रेगुलर जमानत
1. कई मामलों में आरोपी की जमानत गिरफ्तार होने से पहले ही ले ली जाती है, इस तरह की जमानत अग्रिम जमानत कहलाती है. इस तरह की जमानत मारपीट, धमकी, लापरवाही से वाहन चलाना, लापरवाही से वाहन चलाते हुए किसी को जान से मार देना आदि...
2.रेगुलर जमानत... आरोपी के गिरफ्तार होने के बाद जेल में रहते हुए या थाने से ही जमानत मिल सकती है... ऐसी जमानत को रेगुलर जमानत कहा जाता है.

 अपराध
  1. गैर जमानती अपराध जैसे लूट, डकैती, हत्या, हत्या का प्रयास, बलात्कार, अपहरण ऐसे मामलों में जमानत का निर्णय अदालत ही करती है. 
  2. जमानती अपराध, मारपीट, किसी प्रकार की लापरवाही, या कोई मामूली झगड़ा आदि... 
जमानत कैसे व कब मिल सकती है ?
     कई बार पुलिस किसी मामले में चार्जशीट दाखिल नहीं करती है तो मामला कितना भी गंभीर क्यों ना हो आरोपी को जमानत मिल जाती है... ऐसे मामलों में 10 साल की सजा ले अपराध की धारा भी क्यों ना लगी हो, जमानत मिल जाती है... 10 साल या अधिक की सजा वाली धाराओं में 90 दिन में चार्जशीट पेश करनी होती है, अगर पुलिस इसमें असफल रहती है तो आरोपी को जमानत मिल सकती है. 
          
जमानती
   जमानती कोई भी रिश्तेदार या मित्र हो सकता है, कोर्ट किसी की जमानत लेते समय जमानती से आरोपी का रिश्ता पूछता है, और जमानत देने का कारण भी पूछ सकता है, जमानती के जवाब से संतुष्ट होकर कोर्ट निश्चित की गई राशि और उसकी एवज में जमानती से उसके वाहन या संपति के कागजात जमा करवाता है... और आरोपी को जमानत दे देता है.

  निचली अदालत से जमानत रद्द हो जाने की स्थिति में

निचली अदालत यानी सेशन कोर्ट से जमानत रद्द हो जाने पर आरोपी हाई कोर्ट में अपनी जमानत लगा सकता है...!

 जमानत मिलना कितना आसान है...?
  
आरोपी का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, आरोपी से किसी को कोई खतरा नहीं है या फिर जमानत पर बाहर आने पर उस मामले से संबंधित सबूतों और गवाहों को आरोपी से कोई खतरा नहीं है तो कोर्ट जमानत आसानी से दे देता है. इन सबके अभाव में जमानत मिलना काफी मुश्किल होती है.

किसी आरोपी का जमानती बनने से पहले किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
          फौजदारी मामलों में आरोपी को अदालत से जमानत मिलती है तो अदालत निजी मुचलके के साथ-साथ एक तय की गई राशि के साथ एक जमानती भी लाने के लिए कहती है, जमानती कोई रिश्तेदार या दोस्त हो सकता है... जमानती की जिम्मेदारी मुचलका भरने तक ही नहीं होती, जेल से रिहा होने के बाद जब-जब तारीख तय करती है, और आरोपी तारीख पर हाजिर नहीं होता है तो उसे कोर्ट में हाजिर करने की जिम्मेदारी उस जमानती की होती है...!
     जमानती से कोर्ट जमानत देते समय एक हलफनामा दाखिल करने के लिए कहती है, इस हलफनामे में जमानती का पूरा विवरण, उसक नाम, पता और जमानत में बॉन्ड में दी जा रही राशि और अपनी संपति के दस्तावेज आदि का पूर्ण विवरण देना होता है... जमानती का आरोपी से किस प्रकार का संबंध है, उसका विवरण... अगर रिश्तेदार है तो क्या रिश्ता है, दोस्त है तो कितने समय से दोस्त है, उनकी दोस्ती कहां पर और कब हुई... आदि विवरण देना होता है.
    हलफनामे में इस बात का विवरण भी देना होता है कि आरोपी पर उसका पूरा नियंत्रण है, कोर्ट जब भी आरोपी को हाजिर करने के लिए कहेगा, जमानती उसे कोर्ट में हाजिर कर देगा...!

जमानत पर रिहा होने के बाद आरोपी तारीख पर हाजिर नहीं हो रहा है तो कोर्ट जमानती को नोटिस जारी करती है... जमानती को कोर्ट अगली तारीख पर आरोपी को हाजिर करने का मौका देती है, अगर आरोपी को जमानती अगली तारीख पर कोर्ट में पेश करने में विफल रहता है तो, कोर्ट जमानती द्वारा कोर्ट में जमानत के समय भरी गई मुचलके की राशि जब्त कर लेती है... इसके बाद भी जमानती आरोपी को कोर्ट में हाजिर नहीं करता है तो अदालत जमानती पर सिविल कोर्ट में CrPc सेक्शन 446 के तहत प्रकरण दर्ज करती है, जिसमें जमानती द्वारा दिए गए संपति के दस्तावेजों के आधार पर उस संपति की कुर्की, और जमानती को 6 माह तक की जेल की सजा सुना सकती है...! 
       इसके बावजूद भी आरोपी कोर्ट में पेश नहीं होता है तो उसके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी करती है और उसे भगौड़ा घोषित करके उस पर कार्यवाही शुरू की जाती है...! 


    जब भी किसी आरोपी को जमानत देनी हो तो आरोपी का बैकग्राउंड और उसके आचरण की अपने स्तर पर जांच कर लेनी चाहिए... ताकि भविष्य में किसी बड़ी परेशानी में पड़ने से बचा जा सके...!



ये थी किसी की जमानत देते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और जमानत किस प्रकार होती है, उस पर जानकारी...
ये जानकारी आपके लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है... आपको ये जानकारी कैसी लगी... कमेंट करके जरूर बताइए...!

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